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गर्भवती न पीएं 2 कप से ज्यादा ग्रीन टी

गर्भवती न पीएं 2 कप से ज्यादा ग्रीन टी, शिशु का ये अंग होगा प्रभावित
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सच्चाई यह है कि ग्रीन टी के कई फायदे हैं लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व भी शामिल हैं, जो नुकसान पहुंचा सकते हैं। आइए जानते हैं एम्‍स, दिल्‍ली की न्‍यूट्रिशनिस्‍ट डॉ. वसुंधरा सिंह से

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प्रेग्‍नेंसी में ग्रीन टी पीने के फायदे और नुकसान

ग्रीन टी का हेल्थ डिक्शनरी में विशेष स्थान हासिल है। स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने वाले लोग, खासतौर पर डाइटिंग करने वाले लोग इसे अपनी डाइट में शामिल करते हैं। आजकल एक मेसेज सर्कुलेट हो रहा है, जिसमें ग्रीन टी के नुकसानों के बारे में बताया जा रहा है। इससे लोगों के मन में आशंकाएं पनप रही हैं। सच्चाई यह है कि ग्रीन टी के कई फायदे हैं लेकिन इसमें कुछ ऐसे तत्व भी शामिल हैं, जो नुकसान पहुंचा सकते हैं। आइए जानते हैं एम्‍स, दिल्‍ली की न्‍यूट्रिशनिस्‍ट डॉ. वसुंधरा सिंह से


खाने के साथ न लें
ग्रीन टी को खाने के साथ नहीं पीना चाहिए। दरअसल ग्रीन टी में कैटेकिन (catechin) मौजूद होता है। यह तत्व शरीर में आयरन के अवशोषित होने में दिक्कत पैदा करता है, जिससे शरीर में आयरन की समस्या हो सकती है इसलिए अगर ग्रीन टी पीनी भी है तो दो मील के बीच में पिएं और खाने में विटमिन सी और आयरन की मात्रा बढ़ा दें।

गर्भावस्था में बचें

गर्भवती या स्तनपान करवाने वाली स्त्रियों को दिन में दो कप से ज्य़ादा ग्रीन टी नहीं पीनी चाहिए। इसका ज्य़ादा मात्रा में सेवन गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इतनी मात्रा में 200 एमजी कैफीन होता है, इससे अधिक कैफीन गर्भावस्था में खतरनाक हो सकता है। कैफीन दूध के जरिये शिशु तक भी पहुंचता है, जो उसके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता।


खाली पेट न लें

एक कप ग्रीन टी में 24-25 एमजी कैफीन होता है। अगर आप दिन में चार से पांच कप ग्रीन टी पीती हैं तो कैफीन की मात्रा इतनी बढ़ जाएगी कि इसके कारण घबराहट, चक्कर, डायबिटीज, कब्ज,अनिद्रा, सीने में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खाली पेट भी ग्रीन टी का सेवन नहीं करना चाहिए। इससे एसिडिटी की समस्या हो सकती है।



दवाओं के साथ न लें
ग्रीन टी कुछ दवाओं के साथ मिलकर नुकसान पहुंचाती है। खासतौर पर ऐसी दवाएं जो नर्वस सिस्टम के लिए होती हैं, उनके साथ ग्रीन टी नहीं पीनी चाहिए। दरअसल ग्रीन टी में मौजूद कैफीन नर्वस सिस्टम को प्रोऐक्टिव कर देता है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो सकती हैं।



ध्यान रखें

ऑस्टियोपोरोसिस वह स्थिति है, जब कैल्शियम की अधिक कमी से हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। ग्रीन टी की वजह से हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम का इस्तेमाल नहीं हो पाता और वह शरीर से बाहर निकल जाता है। ऐसे में कैल्शियम की कमी ऑस्टियोपोरोसिस का जोखिम बढ़ा सकती है।




प्रेग्नेंसी में चौथे महीने बाद होता है पेट में दर्द, तो हो जाएं सावधान!
प्रेगनेंसी के दौरान पेट दर्द केवल गैस की वजह से नहीं होता है, इसके लिए दूसरे कारक भी जिम्‍मेदार होते हैं, इस स्‍लाइडशो में पढि़ये कि यह समस्‍या गैसा है या कुछ और।

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प्रेगनेंसी के दौरान पेट दर्द

गर्भावस्था के दौरान पेट में जकड़न या ऐंठन होना आमतौर पर सामान्य है। लेकिन क्या यह दर्द पेट में गैस बनने के कारण होता है? जी हां यह भी संभव है लेकिन इसके अलावा भी इसके दूसरे कारण भी हो सकते हैं। दरअसल इस समय आपके गर्भ में पल रहे शिशु से गर्भ का आकार बड़ा हो रहा होता है। जिसके चलते अगल-बगल के अंग, आंत, मांस-पेशियों, लिगामेंट आदि पर भी भार व तनाव पड़ता है। जिसके कारण पेट में दर्द होता है। चलिये जानें प्रेगनेंसी के दौरान पेट दर्द की क्या संभव वजहें हो सकती हैं।

क्या ऐसे में डॉक्टर से मिलना चाहिए
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यदि दर्द हल्का है और कुछ ही समय के लिए रहता है, तो वह गर्भावस्था में सामान्य बात है। यह पेट में गैस के कारणभी हो सकता है। लेकिन अगर दर्द बहुत ज्यादा हो और ठीन न हो रहा हो तो डॉक्टर से संपर्क जरूर करना चाहये। दर्द के साथ यदि बुखार, योनी से खून या मवाद आना, चक्कर आना, कमजोरी महसूस होना आदि लगना इत्यादि आदि लक्षण भी नज़र आएं तो यह गैस का दर्द नहीं है।

इम्प्लांटेशन

पहले हफ्ते में नवजात एमब्र्यो (बीज) का युटेरस के दीवार से सट जाने को इम्प्लांटेशन कहा जाता है। यह दरअसल गर्भ के शुरूआत में होता है। लेकिन कभी-कभी इसके साथ वजीना से हल्का खून भी आ सकता है।


कब्ज की वजह से


प्रेगनेंसी के दौरान युटेरस का आंतों पर दवाब पड़ने के कारण कभी-कभी कब्ज की शिकायद होना आम बात है। इससे बचने के लिए पर्याप्त पानी पीना चाहिए और आहार में हरी पत्तेदाक सब्जियों की मात्रा को बढ़ाना चाहिए। 


क्रेम्पिंग या लेबर पेन्स
डिलिवरी का टाइम आने पर पेट में दर्द कुछ अलग तरह से आता है। साधारणतौर पर यह गर्भावस्था का समय पूरा हो जाने पर ही होता है। यह दर्द हर 5 मिनट पर आता है और काफी तेज़ होता है जैसे कि पीठ दर्द या मासिक धर्म में होता है। इसके साथ ही योनी से पानी या खून भी आ सकता है। कई बार यह दर्द गर्भकाल पूरा होने से पहले भी हो सकता है, जिसे प्रीमेच्योर लेबर पेन्स (premature labor pains) कहा जाता है। इऐसे में तुंरत अस्पताल जाना चाहिये।




इस उम्र में गर्भवती होने वाली महिलाओं को रहता है हार्ट अटैक का खतरा
अगर आप कामकाजी महिला हैं और अभी गर्भधारण ना करके लेट प्रेगनेंसी का प्लान की हुई हैं तो संभल जाएं। लेट प्रेगनेंसी आपके हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ा सकती है।

लेट प्रेगनेंसी

आज कई करियर ओरिएंटेड महिलाएं देर से गर्भधारण करने की प्लानिंग करती हैं। जबकि महिलाओं में 30 की अवस्था के बाद प्रजनन क्षमता और शारीरिक क्षमता में कमी आने लगती है औऱ यह कमी 35 साल की अवस्था के बाद और अधिक हो जाती है। दरअसल 30 की उम्र के बाद महिलाओं में डिम्बक्षरण के लिए बाहर आने वाले डिम्बों की संख्या में कमी आ जाती है जिससे डिम्बों के स्वास्थ्य में कमी आ जाती है। साथ ही हार्मोंस में भी कई तरह के बदलाव होते हैं। इन बदलावों के कारण डिम्बक्षरण में भी बदलाव होते हैं।
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इस अवस्था में कई खतरे
बड़ी उम्र पर मां बनने से महलाओं को कई खतरों का सामना करना पड़ता है। उनकी प्रजनन क्षमता में तो कमी आती ही है। साथ ही हाई ब्लड-प्रेशर, डायबीटिज, गर्भपात, सिजेरियन डिलीवरी और शिशु का जन्मजात विकृतियों के साथ पैदा होना भी शामिल है। लेकिन इन सबके अलावा, लेट प्रेगनेंसी हार्ट अटैक के खतरे को भी बढ़ाती है। 


क्या कहती है स्टडी
लेट प्रेगनेंसी पर हाल ही में एक नई स्टडी आई है जिससे इस बात की पुष्टि हुई है कि लेट प्रेगनेंसी हार्ट अटैक के खतरे को बढ़ा देती है। इस स्टडी के अनुसार वे महिलाएं जो 40 साल की उम्र में गर्भधारण करती हैं उनमें हार्ट अटैक का खतरा अधिक बढ़ जाता है। वर्तमान दौर में अधिकतर महिलाएं देर से गर्भधारण करती हैं जिसके दो मुख्य कारण हैं - देर से शादी या करियर। कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी माना है कि जो महिलाएं 40 या उसके बाद गर्भधारण करती हैं उनमें हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। 


शोध को जाने

स्टडी में यह बात भी सामने आई है कि लेट प्रेगनेंसी से महिलाओं का स्वास्थ्य में कई तरह से प्रभावित होता है। इस स्टडी के लिए शोधकर्ताओं ने 70,000 महिलाओं पर अध्ययन किया है। अध्ययन में 50 से 80 साल तक की महिलाओं को शामिल किया गया है। शोधकर्ताओं ने इन महिलाओं को दो समूहों में बांटा। एक समूह में उन महिलाओं को रखा गया था जिन्होंने जल्दी गर्भधारण किया था और दूसरे समूह में उन महिलाओं को रखा गया था जिन्होंने देर से गर्भधारण किया था। 


लेट प्रेगनेंसी में हार्ट अटैक का खतरा अधिक

इस स्टडी के निष्कर्ष में ये बात सामने आई कि जिन महिलाओं ने देर से गर्भ धारण किया था उनमें हार्ट अटैक आने का खतरा बढ़ गया था। शोधकर्ताओं ने ये भी निष्कर्ष निकाला कि इन महिलाओं का कार्डियोवास्कुलर स्वास्थ्य भी प्रभावित हुआ।




प्रेग्नेंसी में करें ये छोटा सा काम, नहीं बढ़ेगा ज्यादा वजन
आपको ये जानकर हैरानी होगी कि गर्भावस्था के वक्त महिलाओं का ये वजन सिर्फ खानपान से ही नहीं बढ़ता है। बल्कि अनजाने में महिलाएं कुछ ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो वजन बढ़ने के लिए जिम्मेदार हैं।


प्रेग्नेंसी में वजन बढ़ना
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जब कोई महिला प्रेग्नेंट होती है तो उसके शरीर में सामान्य महिलाओं से अलग कई तरह के बदलाव होते हैं। जिसमें से अचानक वजन बढ़ना भी शामिल है। प्रेग्‍नेंसी में महिलाओं का 7 से 18 किलो बढ़ना आम बात है। हालांकि प्रेग्नेंसी में ज्यादा वजन बढ़ना अच्छी बात नहीं है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि गर्भावस्था के वक्त महिलाओं का ये वजन सिर्फ खानपान से ही नहीं बढ़ता है। बल्कि अनजाने में महिलाएं कुछ ऐसी गलतियां कर बैठती हैं जो वजन बढ़ने के लिए जिम्मेदार हैं।


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नींद की कमी
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कई महिलाओं को रात के वक्त बुक्स पढ़ने या फिल्में देखने का शौक होता है। जिसके चलते नींद पूरी तरह से डिस्टर्ब होती है। नींद की कमी के चलते भी प्रेग्नेंसी में महिलाओं का वजन बढ़ता है। गर्भावस्था के दौरान होने वाले शारीरिक और हार्मोनल बदलावों की वजह से महिलाओं को अधिक आराम की जरुरत पडती है। इसलिए गर्भावस्था में नींद के साथ किसी तरह की लापरवाही ना बरतें।

तनाव है मोटापे का कारण

प्रेग्नेंसी में तनाव लेना महिलाओं के लिए बहुत बड़ा दुश्मन साबित हो सकता है। जो महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान भी वर्किंग होती हैं उनमें तनाव का स्तर अधिक देखा जाता है। जबकि ऐसी अवस्था में महिलाओं को पूरी तरह फ्री माइंड और खुश रहने की जरूरत होती है। प्रेग्‍नेंसी में जितना हो सके उतना तनाव से दूर रहना चाहिए।


डायबिटीज और हाइपरटेंशन

बिगड़े खानपान और अस्त-व्यस्त लाइफस्टाइल के चलते आजकल कई महिलाओं में डायबिटीज और हाइपरटेंशनकी बीमारी देखी जा रही है। कई महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज और हाइपरटेंशन भी होती है। यह शिशु पर तो प्रभाव डाल ही सकता है साथ ही ये मोटापा बढ़ने के भी कारण हैं। कुछ मात्रा में इस मोटापे का असर शिशु पर भी पड़ता है।

अधिक कैलोरी लेना

स्वास्थ्य लाभ के चलते प्रेग्नेंसी में महिलाओं को अधिक कैलोरी वाले व्यंजन खिलाए जाते हैं। इसके साथ ही कई महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान भूख भी अधिक लगती है। जिसकी वजह से प्रेग्‍नेंस के शुरुआती दौर में वजन तेजी से बढ़ जाता है। अगर आप रोजाना 450 अतिरिक्त कैलोरी लेते हैं, तो हफ्तेभर में आपका वजन आधा किलो तक बढ़ सकता है, जो महीनेभर में 2 किलोग्राम तक बढ़ा सकता है।

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