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इस आसन के बाद टिक नहीं पायेगी पुरानी से पुरानी कब्ज


इस आसन के बाद टिक नहीं पायेगी पुरानी से पुरानी कब्ज

योग में ऐसे कई आसन हैं जिसको करने से आपकी कब्ज की समस्या जड़ से समाप्त होकर पेट की चर्बी हटकर पेट नरम हो सकता है। उन्हीं सबसे उत्तम आसनों में से एक है उदराकर्षण। इस योग को नियमित करने से आपकी कब्जियत और तोंद की समस्या समाप्त हो सकती है।

कहते हैं कि पैर गरम, पेट नरम और सिर ठंडा हो चाहिए। यह आसन आपके पेट को नरम कर देता है। इसे करने से पेट की चर्बी कम होती है और शरीर सुडौल रहता है।

उदराकर्षण करने की विधि :
*आप सबसे पहले आप दोनों पंजों के बल पर बैठ जाएं।
*गहरी श्वास लें और फिर दाहिने घुटने को भूमि पर टिकाएं और बाएं घुटने को उपर छाती के पास रखें। दोनों ही घुटने अपने हाथ के पंजे से कवर करें। दाहिने घुटने को भूमि पर टिकाते वक्त ध्यान दें कि आपका पंजा तो भूमि पर ही रहे, लेकिन एड़ी हवा में हो।
*अब इसी स्थिति में पूरा शरीर गर्दन सहित बाईं ओर घुमाएं। ऐसी स्थिति में दायां घुटना बाएं पंजे के ऊपर स्पर्श करेगा और अब दाहिने पैर की एड़ी को देखें।
*शुरुआत में एक से दो मिनट तक इसी अवस्था में रहें फिर सामान्य अवस्था में लौट आएं। लौटते वक्त श्वास पूर्णत: बाहर होना चाहिए। इस आसन को लेट कर भी किया जाता है।

लाभ: कब्ज और तोंद में अत्यंत लाभदायक यह आसन आप एक दिन में दो से तीन बार करें।

इस प्राणायाम से तुरंत घटने लगता है डिप्रेशन


‘डिप्रेशन’ का कारण वातावरण, परिस्थिति, स्वास्थ्य, सामर्थ्य, संबंध या किसी घटनाक्रम से जुड़ा हो सकता है। शुरुआत में व्यक्ति को खुद नहीं मालूम होता, किंतु उसके व्यवहार और स्वभाव में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगता है। कई बार अतिरिक्त चिड़चिड़ापन, अहंकार, कटुता या आक्रामकता अथवा नास्तिकता, अनास्था और अपराध अथवा एकांत की प्रवृत्ति पनपने लगती है या फिर व्यक्ति नशे की ओर उन्मुख होने लगता है।

ऐसे में जरूरी है कि हम किसी मनोचिकित्सक से संपर्क करें। व्यक्ति को खुशहाल वातावरण दें। उसे अकेला न छोड़ें तथा छिन्द्रान्वेषणकतई न करें। उसकी रुचियों को प्रोत्साहित कर, उसमें आत्मविश्वास जगाएं और कारण जानने का प्रयत्न करें।

मैत्रीपूर्ण वातावरण में प्रभावोत्पादक तरीके से जीवन की सच्चाई उसके सामने रखें और आत्मीयता से उसे ‘प्राणायाम’ के लिए राजी करें। सर्वप्रथम पद्मासन करवाएं। फिर प्राणायाम के छोटे-छोटे आवर्तन करवाएं। बीच में गहरी श्वास लेने दें। आप देखेंगे ‘डिप्रेशन’ घटता जा रहा है। चित्त शांत हो रहा है। नाड़ीशोधन प्राणायाम के पश्चात ग्रीष्मकाल में ‘शीतली’ और शीतकाल में सावधानी से ‘भस्त्रिका’ प्राणायाम करवाएं।

प्राणायाम के दो आवर्तनों के पश्चात ‘ॐ’ नाद करवा दें। प्रथम स्तर पर ‘ओ’ दीर्घ करवाएं, जिससे ग्रीवा के अंदरूनी स्नायु कंपन, लय और बल पाकर सहज हों। तत्पश्चात ‘ओ’ लघु से दीर्घनाद करवाएँ। इसके कंपन मस्तिष्क, अधर-ओष्ठ और तालू को प्रभावित करेंगे। अनुभूत आनंद से चेहरे के खिंचाव और तनाव की स्थिति स्वतः जाती रहेगी। यदि ऐसा होने लगे तो समझिए आप कामयाब हो रहे हैं अपने ‘मिशन’ में। इसके बाद थोड़ा विश्राम। फिर श्वासन। अनिद्रा जनित ‘डिप्रेशन’ का रोगी ऐसे में सोना चाहता है। उसे भरपूर नींद ले लेने दें।

ये प्रक्रियागत परिणाम तुरंत प्राप्त होते हैं। इनके दीर्घकालीन स्थायित्व के लिए प्रयत्न में निरंतरता रखी जानी अनिवार्य है। सदैव अनुभवसिद्ध योग विशेषज्ञ ही से संपर्क किया जाना चाहिए।


हल्के में न लें खर्राटों को


करीब 40 प्रतिशत वयस्क पुरुष और 24 फीसदी महिलाओं में की समस्या देखी जाते हैं। 70 साल की उम्र के बाद पुरुषों में खर्राटे आने की प्रक्रिया कम हो जाती है। पीठ के बल सोने से खर्राटे आने की संभावना अधिक हो जाती है। शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने से गले की मांसपेशियां शिथिल हो जाती हैं। इससे भी खर्राटे आने लग जाते हैं। जुकाम या अन्य एलर्जी के कारण बलगम का जमाव भी खर्राटों का कारण बन सकता है।

खर्राटे की आवाज बहुत अधिक हो सकती है, यहां तक कि खुद खर्राटे मारने वाला व्यक्ति उनसे जग सकता है। अधिकांश मामलों में लोगों को खुद पता नहीं होता कि वे खर्राटे मारते हैं। जो व्यक्ति खर्राटे मारते हैं, उन्हें नींद से जागने के बाद सूखा मुंह और गले में जलन का एहसास हो सकता है।

हल्के खर्राटे नींद में कोई बाधा नहीं डालते, ज्यादा तेज खर्राटों के कारण शरीर में काफी समस्याएं हो सकती हैं जैसे – ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया (Obstructive Sleep Apnea; नींद और सांस लेने में बाधा), नींद में कमी आदि। इन समस्याओं के अलावा खर्राटे कई प्रकार की बीमारीयों के भी जोखिम पैदा कर देते हैं जैसे, हृदय रोग, स्ट्रोक, डायबिटिज और अन्य प्रकार की कई बिमारीयां।
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रक्तचाप बढ़ा है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं
खर्राटे को अक्सर नींद के डिसऑर्डर के साथ जोड़ा जाता है जिसको ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया – ओएसए (obstructive sleep apnea – OSA) कहा जाता हैं। हालांकि, जरूरी नहीं है कि हर कोई जो खर्राटे मारता है उसे ओएसए हो। लेकिन अगर खर्राटों के साथ निम्नलिखित में से कोई भी लक्षण दिखें तो डॉक्टर को दिखाने में देरी नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया के संकेत दे सकते हैं –
1. सोने के दौरान नाक से आवाज आना
2. दिन में ज्यादा नींद आना
3. ध्यान देने में कठिनाई
4. सुबह सिर में दर्द होना
5. गले में खराश होना
6. नींद में बेचैनी
7. रात को सोते समय दम घुटना या हांफना
8. उच्च रक्तचाप
9. रात के समय छाती में दर्द (एनजाइना)
10. खर्राटों में बहुत ज्यादा आवाज (पास सो रहे आपके साथी को परेशानी)
11. दम घुटने से नींद से जागना
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मांसपेशियों की कमजोरी बन सकती है कारण:
जब मुंह और नाक के अंदर से निकलने वाला रास्ता रूक जाता है या कम हो जाता है तब खर्राटे की स्थिति पैदा होने लग जाती है। हवा का बहाव कम होने के निम्न कारण हो सकते हैं।
1. नाक के वायुमार्ग में रूकावट – कुछ लोगों को खर्राटे सर्दी के दिनों में या साइनस में संक्रमण के दौरान ही होते हैं। नाक में विकृति होना जैसे सैप्टम (नाक के रास्ते को दो भागों में बांटने वाली दीवार) का टेढ़ापन या नाक के अंदर निकले छोटे-छोटे कणों के कारण भी वायुमार्ग में रुकावटें आ सकती हैं।
2. मांसपेशियों की कमजोरी – गले और जीभ की मांसपेशियां जब बहुत शांत और शिथिल हो जाएं, तो इनकी मांसपेशियां रास्ते में लटकने लग जाती हैं और रास्ता रूक जाता है। आम तौर पर यह गहरी नींद, अधिक एल्कोहॉल सेवन या नींद की गोलियां लेने के कारण होता है। उम्र के बढ़ने से मांसपेशियों का सुस्त हो जाना भी एक साधारण बात है।
3. गले के ऊतकों में भारीपन – गले को ऊतकों का आकार बढ़ जाना अक्सर मोटापे के कारण होता है। कई बार वे बच्चे जिनके टॉन्सिल (tonsils) या एंडीनोइड्स (adenoids) का आकार बड़ा हो जाता है उनको भी खर्राटे मारने की परेशानियां होने लगती हैं।
4. पैलेट या यूव्यूला (uvula) का आकार बढ़ना और नरम होना – हमारे गले के बीच में लटक रहे ऊतक को यूव्यूला टीश्यू कहते हैं। यूव्यूला या तलुए का आकार ज्यादा बढ़ने से नाक से गले में खुलने वाला रास्ता बंद हो सकता है। हवा के संपर्क में आकर यूव्यूला में थर्थराहट उत्पन्न होती हैं जिससे खर्राटे कहा जाता है।

बचाव के लिए वजन तो घटाना ही पड़ेगा
1. अगर मोटापा है तो वजन घटाएं – वजन ज्यादा होने से शरीर के अन्य भागों की तरह गले में भी चर्बी ज्यादा हो जाती है। और ऊतकों की ज्यादा संख्या होने से खर्राटे आना शुरू हो सकते हैं। वजन कम करके आप खर्राटे रोक सकते हैं।
2. एक तरफ मुंह करके सोएं – खर्राटे मारना सोने के तरीके पर भी निर्भर करता है। पीठ के बल सोने से जीभ पीछे की तरफ सरक जाती है। इससे वायुमार्ग संकुचित हो जाता है, और हवा अवरुद्ध हो जाती है। इसलिए एक तरफ मुंह करके सोना चाहिए। अगर आप हर रोज सुबह खुद को पीठ के बल सोया हुआ पाते हैं, तो उसके लिए अपने पजामें के पीछे, उपरी भाग में सिलाई के साथ एक टेनिस बॉल लगा लें।
3. नेजल स्ट्रिप्स का प्रयोग करना – नेजल स्ट्रिप एक चिपकने वाली पट्टी होती है जिसको नाक के उपर से दोनों हिस्सों में लगाया जाता है। नेजल स्ट्रिप की मदद से नाक के अंदर की जगह खुल जाती है और हवा में कोई रुकावट नहीं होती। इसको खर्राटों पर नियंत्रण पाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि जिन लोगों को स्लीप एप्निया जैसी समस्याएं हैं, कई बार उनके लिए ये स्ट्रिप काम नहीं कर पाती।
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4. नाक की रुकावटों का इलाज – नाक में एलर्जी या नेजल सैप्टम (नाक की बीच वाली दीवार का भाग) के आकार की असामान्यता भी हवा के प्रवाह को कम कर सकती है। ऐसा होने पर हवा की पूर्ति करने के लिए मुंह से सांस लेने के लिए दबाव बढ़ता है जिसके परिणामस्वरूप खर्राटे शुरू हो जाते हैं। नाक में बलगम आदि के जमाव को ठीक करने के लिए, लगातार तीन दिन से ज्यादा स्प्रे डिकॉन्जेस्टेंट (सर्दी जुकाम की दवाइयां) का उपयोग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बहुत जरूरी है। लंबे समय तक प्रयोग करने से इन दवाओं का प्रभाव उल्टा पड़ सकता है, जिससे नाक की समस्याएं और ज्यादा बढ़ सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति नाक की इस रुकावट से काफी दिनों से परेशान है तो डॉक्टर की मदद से एक बढ़िया स्टेरॉयड स्प्रे का उपयोग कर सकते हैं।
5. एल्कोहॉल और अन्य नशीली दवाओं के सेवन से बचें – सोने के कम से कम दो घंटे पहले कोई भी शराब या अन्य सोढ़ा पेय पदार्थ को ना पिएं और डॉक्टर को उसके बाद के अनुभव के बारे में बताएं। शराब व अन्य नशीले पदार्थ तंत्रिका तंत्र पर दबाव डाल देते हैं, जिसके कारण मांसपेशियां फैलने लग जाती हैं। इनमें शामिल गले के ऊतक भी फैलने लगते हैं और खर्राटें आने का कारण बनते हैं
6. धूम्रपान छोड़ें – धूम्रपान में कमी खर्राटों होने के कारणों को भी कम कर देता है, इसके अलावा धूम्रपान छोड़ देने के अन्य भी कई फायदे होते हैं।
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7. पर्याप्त नींद लें – व्ययस्कों को कम से कम 7 से 8 घंटे की नींद लेनी चाहिए। बच्चों के लिए पर्याप्त नींद की मात्रा भी उनकी उम्र के साथ बदलती रहती है। प्री-स्कूल की उम्र के बच्चों को 10 से 12 घंटे तक सोना चाहिए। स्कूल उम्र के बच्चों को कम से कम 10 घंटे की नींद लेनी चाहिए। और किशोरों के लिए भी 9 से 10 घंटे की नींद जरूरी है।

ऐसे भी कर सकते हैं खर्राटे का परीक्षण
खर्राटे की समस्या का पूर्ण तरीके से आंकलन करने के लिए, पीड़ित व्यक्ति के साथ में सोने वाले या घर के किसी मेंबर से बात करना बहुत महत्वपूर्ण है। निदान के लिए डॉक्टर पीड़ित व्यक्ति को पहले हुई बीमारीयों और ली गई दवाईयों की जानकारी भी ले सकते हैं।
डॉक्टर मरीज के साथी को मरीज के बारे में कुछ बातें पूछेंगे – जैसे कि, उसे खर्राटे कब आते हैं और किस तरह से आते हैं – ताकि समय की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सके। अगर किसी बच्चे को खर्राटे की समस्या है तो उसके माता-पिता से उसके खर्राटे की गंभीरता के बारे में पूछने की कोशिश की जाती है।
इसके अलावा, मरीजों से उनके सोने के तौर तरीकों के बारे में जानकारी ली जा सकती है। दिन में सोने के लक्षण, दिन में नींद के कारण उंघना, या रात में जागने की आवृत्ति के बारे में जानना डॉक्टरों के लिए बहुत जरूरी होता है।

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एक संपूर्ण शारीरिक परिक्षण भी किया जा सकता है, जिसमें ये सब किया जाएगा –
1. मरीज के वजन का आंकलन किया जाएगा
2. बॉडी मास इंडेक्स (BMI) का हिसाब लगाया जाएगा
3. गर्दन की बाहरी मोटाई का नाप लिया जाएगा
4. गले, नाक और मौखिक कैविटी को परखा जाएगा ये देखने के लिए कि वायुमार्ग कितने पतले और संकुचित हैं।

इसके अलावा आपके डॉक्टर कुछ टेस्ट करवाने को भी कह सकते हैं।
1. इमेजिंग (imaging):
डॉक्टर मरीज के कुछ इमेंजिग टेस्ट ले सकते हैं जैसे, एक्स-रे, कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी स्कैन (computerized tomography scan) या मैग्नेटिक रोजोनेंस इमेजिंग (magnetic resonance imaging)। इन सभी टेस्ट से नाक और मुंह से हवा में होने वाली रुकावटों की जांच की जाती है।
2. नींद अध्ययन या स्लीप स्टडी
खर्राटे और उनके लक्षणों की जानकारी के लिए डॉक्टर स्लीप स्टडी की मदद ले सकते हैं। इस अध्ययन को मरीज के सोने के बाद किया जाता है, और अक्सर डॉक्टर मरीज के घर आकर इसको पूरा करते हैं।
मरीज की अन्य मेडिकल समस्या या नींद के लक्षणों के आधार पर, नींद के अध्ययन के दौरान डॉक्टरों की एक टीम द्वारा मरीज की नींद की आदतों पर गहराई से विश्लेषण किया जा सकता है। ऐसे में मरीज को रात भर एक नींद अवस्था में रहने की आवश्यकता हो सकती है इस पोलीसोमोनोग्राफी (polysomnography) कहा जाता है।
पोलीसोमोनोग्राफी में मरीज को सोते समय कई उपकरणों से जोड़कर पूरी रात निरिक्षण के लिए छोड़ दिया जाता है। स्लीप स्टडी में मरीज के सोते समय मस्तिष्क की तरंगे, खून में ऑक्सीजन का स्तर, हद्य गति, सांस लेने की गति, और आंख तथा टागें कि गतिविधी आदि सब कुछ मशीनों की मदद से रिकॉर्ड किया जाता है।

खर्राटे का इलाज
कई बार जीवनशैली में कुछ बदलाव करके खर्राटों की समस्या से राहत मिल सकती है। इससे फर्क ना पड़ने पर इलाज करवाकर भी खराटों से छुटकारा पाया जा सकता है।

1. जीवनशैली में बदलाव –
खर्राटों की समस्या के लिए डॉक्टर भी मरीजों को पहले जीवनशैली में बदलाव लाने की सलाह देते हैं जिनमें कुछ ऐसी टिप्स मौजूद होती हैं –
1. अगर मरीज का ज्यादा वजन है तो वजन घटाएं
2. शराब पीना छोड़ दें या कम करें (खासतौर पर सोने से 3 या 4 घंटे पहले)
3. धूम्रपान छोड़ दें
4. नियमित रूप से व्यायाम करना (व्यायाम करने से गले की कोशिकाएं मजबूत रहेंगी और रुकावटों से लड़ने के लिए शरीर को शक्ति मिलेगी)

खर्राटे पर नियंत्रण करने के लिए तकनीक
पीठ के बल सोने से खर्राटों की समस्या बढ़ सकती है।इसलिए साइड के बल सोना बेहतर होता है। साइड में सोने की आदत बनाने के लिए आप इस तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं –
• एक टीशर्ट में पीछे की तरफ दोनों कंधों के बीच एक जेब सिल लें
• उसमें टेनिस या उसके आकार की कोई गेंद डाल लें
• क्योंकि गेंद के कारण आप पीठ के बल सो नहीं पाएंगे
2. इयर प्लग्स – अगर आपके खर्राटे मारने की आदत स्वास्थ्य पर कोई बुरा असर नहीं कर रही है तो अपने पार्टनर को इयरप्लग्स लगाने के लिए दीजिए। क्योंकि इससे खर्राटे की आवाज आपके पार्टनर की नहीं सुनेगी, ये समस्या को सुलझाने का एक सस्ता और आसान तरीका है।
3. एंटी स्नोरिंग डिवाइस (खर्राटों को रोकने वाले उपकरण) –
अगर जीवनशैली में बदलाव होने पर भी राहत ना मिले तो एंटी स्नोरिंग डिवाइस का उपयोग किया जा सकता है। ये खर्राटों पर नियंत्रण करने वाले उपकरण होते हैं जो किसी अच्छी मार्केट से मिल जाते हैं। नीचे कुछ ऐसे ही डिवाइसेस के बारे में बताया गया है।
1. नेजल डिवाइस – नेजल यानि नाक संबंधी। अगर खर्राटे की आवाज ज्यादातर नाक से ही आ रही है तो “नेजल स्ट्रिप” (Nasal Strip) का उपयोग किया जा सकता है। यह एक चिपकने वाली पट्टी होती है जिसको नाक के उपर से ले जाते हुऐ उसके दोनो तरफ चिपकाया जाता है, इससे नाक के वायुमार्ग संकुचित नहीं हो पाते।
2. ओरल डिवाइस – ओरल यानि मौखिक। अगर खर्राटे की आवाज मुख्य रूप से मुंह से आ रही है तो आपके लिए चिन स्ट्रिप (chin strip) और वेस्टिबुलर शील्ड (vestibular shield) फायदेमंद हो सकती है। इनमें से चिन स्ट्रिप को चिन यानि ठोड़ी के नीचे लगाया जाता है तो सोते समय मुंह को खुलने से रोकती है। और वेस्टिबुलर शील्ड एक शील्ड यानि ढाल के जैसा डिवाइस होता है यह भी रात को मुंह खुलने से रोकने में मदद करता है।
3. मेंडिबुलर एडवांसमेंट डिवाइस (Mandibular advancement device) – इसको MAD कहा जाता है। अगर खर्राटें की वजह मुख्य रूप से गले में थरथराहट के कारण हो रही है तो ऐसे में MAD का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। देखने में यह डिवाइस वेस्टिबुलर शील्ड के जैसा ही होता है मगर इसको जीभ और जबड़े को आगे खींच कर रखने के लिए डिजाइन किया गया है। इससे गले के वायुमार्ग संकुचित नहीं होते और हवा को निकलने में परेशानी नहीं होती।
4. सर्जरी
खर्राटे का इलाज वैसे तो सामान्य तरीकों से कर दिया जाता है, लेकिन समस्या अगर गंभीर हो जाए जैसे सांस लेने में कठिनाई तो सर्जरी की भी जरूरत पड़ सकती है। नीचे इस समस्या में प्रयोग की जाने वाली कुछ विधियों के बारे में बताया गया है।
कॉन्टीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रैशर (Continuous positive airway pressure; CPAP) – ऑबस्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया से होने वाले खर्राटों की समस्या में अक्सर इसी विधी का प्रयोग किया जाता है। ऑबस्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया के इलाज के लिए CPAP सबसे विश्वसनीय और प्रभावी तरीका माना जाता है। कुछ लोग इसके शोर की वजह से सोने में परेशानी महसूस करते हैं।
पैलेटल इंपलैंट्स (Palatal Implants) – इस प्रक्रिया को पिल्लर या यानि स्तंभ प्रक्रिया के नाम से भी जाना जाता है। डॉक्टर नरम तालु (palate) में पॉलिस्टर की कुछ तारें इंजेक्ट कर देते हैं जिससे तालु थोड़ा कठोर हो जाता है और लटकता नहीं है। इससे हवा के रास्ते में रुकावटें कम हो जाती हैं और खर्राटों की समस्या खत्म हो जाती है। पैलेटल इम्पलैंट्स का कोई साइड इफेक्ट नहीं है, हालांकि इसकी सुरक्षा के मामले में अभी तक शोध किए जा रहे हैं।



ट्रेडिश्नल सर्जरी (Traditional Surgery) – इस प्रक्रिया को यूवीलोपैलेटोफेरिगोंप्लास्टी (uvulopalatopharyngoplasty/UPPP) भी कहा जाता है। इस सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोशी की दवा दी जाती है। सर्जरी के दौरान डॉक्टर गले के ऊतकों को ट्रिम (तराशना) करके उनको टाइट कर देते हैं। इस सर्जरी में खून बहना, संक्रमण, दर्द और नाक में जमाव आदि के जोखिम होते हैं।
लेजर सर्जरी (Laser Surgery) – इसको लेजर एसिस्टेड यूवीलोपैलेटोफेरिगोंप्लास्टी (laser-assisted uvulopalatopharyngoplasty ) के नाम से जाना जाता है। यह खराटे के इलाज के लिए एक आउटपेशेंट सर्जरी होती है। इसमें डॉक्टर एक छोटे लेजर बीम की मदद से पैलेट के अतिरिक्त ऊतकों को हटाते हैं जिससे हवा को जाने का रास्ता मिल सके। इसके बाद मरीज को खर्राटे पर नियंत्र करने के लिए कम से कम एक सत्र का समय लग सकता है।
रेडियोफ्रीक्वेंसी टीश्यू एबलेशन (Radiofrequency Tissue Ablation) – इस सर्जरी को सोमनोप्लास्टी (somnoplasty) कहा जाता है और यह भी एक आउटपेशेंट प्रक्रिया होती है। इसमें भी सामान्य बेहोशी की दवा दी जाती है। अतिरिक्त ऊतकों को तालु से हटाने के लिए डॉक्टर लो इंटेसिटी रेडियोफ्रिक्वेंसी सिग्नल्स का प्रयोग करते हैं। जिससे गले का रास्ता खोला जाता है और खर्राटे की होने वाली आवाज को खत्म किया जाता है।ये एक नई तकनीक है और इसके प्रभाव पर शोध किया जाना अभी बाकी है। सामान्य रूप से सर्जरी की यह प्रक्रिया बाकी अन्य प्रक्रियाओं से कम दर्दनाक है।

खर्राटे से जुड़े जोखिम:-
खर्राटे की आदतें गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का रूप धारण कर सकती है, जैसे ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया (obstructive sleep apnea)। स्लीप एप्निया से कई प्रकार की गंभीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं जैसे:-
1. सांस लेने में रूकावट – यह कुछ सेकिंड से एक मिनट तक होती रहती है। सोते समय गले के रास्ते में कुछ या पूरी तरह से रुकावट होना
2. बार-बार जाग आना – इसमें मरीज को बार-बार नींद से जाग आती रहती है, यहां तक की कई बार तो उसको महसूस भी नही हो पाता।
3. हल्की नींद – बार-बार जाग खुलने से सामान्य नींद में हस्तक्षेप होता है, जिसके कारण गहरी नींद की तुलना में सोने का ज्यादा समय हल्की नींद लेने पर खर्च किया जाता है।
4. हृद्य में तनाव – लंबे समय तक ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया से ग्रस्त रहने से ब्लड प्रैशर बढ़ सकता है, और दिल के आकार में वृद्धि भी हो जाती है। इसके साथ-साथ दिल का दौरा और स्ट्रोक जैसे कई जोखिम हो जाते हैं।
5. नींद में कमी – रात को नींद ना आने के कारण से दिन में सुस्ती होना या उंघना। ऐसी स्थिति में दिन में झपकियां आती हैं जिससे कार या बाईक दुर्घटनाएं होने का जोखिम बढ़ जाते हैं।

खर्राटे से जुड़ी जटिलताएं:-
खर्राटे मारने की आदतों से, पास में सो रहे साथी की नींद में बाधा के अलावा, उसकी परेशानी कुछ बढ़कर हो सकती हैं। अगर खर्राटे की परेशानी ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एप्निया के कारण हुई है तो इसकी कुछ जटिलताएं हो सकती हैं जिनमें निम्न शामिल हैं।
1. दिन में नींद आना
2. मरीज को बार-बार गुस्सा और निराशा होना
3. ध्यान देने में कठिनाई
4. दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप, और स्ट्रोक के खतरे
5. व्यवहार में परेशानी जैसे, उत्तेजित होना,
6. एप्निया से ग्रसित बच्चों को पढ़ने में परेशानी
7. रात में नींद ना आने से दिन में झपकियां आना, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का खतरा

खर्राटे में परहेज़

खर्राटे की समस्याओं से पीड़ितों के लिए कुछ चीजों का परहेज जरूरी होता है, जिनमें से कुछ हैं:-
1. नींद की गोलियां ना लें – कुछ रोगियों को नींद की गोलिया लेने की सलाह दी जा सकती है, मगर सावधानीपूर्वक। क्योंकि जिन लोगों को खर्राटे की समस्याएं हैं तो इन दवाइयों के लेने के बाद उनके गले के ऊतक शिथिल हो जाते हैं, जिससे खर्राटे की समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।
2. रात को भारी भोजन करने से बचें – रात को भारी भोजन ना करें क्योंकि हमारे शरीर को उसे पचाने के लिए ज्यादा समय लगता है, और पचाने कि प्रक्रिया गले के ऊतकों को आराम देती है। सोने से पहले अधिक वसा वाले डेयरी पदार्थ जैसे आइसक्रीम आदि को खाने से बचना चाहिए। दूध के उत्पाद भी बलगम को बाहर निकाल देते हैं।
3. रात को मसाले वाला भोजन न करें – मसाले वाले भोजन से खट्टी डकारें आना शुरू हो जाती है, और इनके कारण से भी खर्राटे आने लगते हैं।
4. धूम्रपान ना करें – धूम्रपान करना या धूम्रपाना करने वाले किसी व्यक्ति के संपर्क में रहने से गले की मांसपेशियां और ऊतकों को आराम मिल जाता है।, धूम्रपान करने से नाक व फेफ़ड़ों में बलगम का जमाव बना देता है। अगर आप धूम्रपान करते हैं तो इसको छोड़ने के आपको बहुत सारे कारण मिल सकते हैं जिनमें से एक खर्राटे की समस्या भी है।
5. सोने से पहले शराब ना पीएं – शराब गले की मांसपेशियों को आराम देती हैं जिस कारण से खर्राटे की समस्या होने लगती हैं। शराब का सेवन करने से सोते समय गले से खर्राटे की आवाजे उत्पन्न होती हैं।
6. एंटीहिस्टामिन्स (Antihistamines) ना लें – अगर आपकी नाक भरी या रूकी है, तो उसको खोलने के लिए एंटीहिस्टामिन्स की बजाए एक बढ़िया विकल्प है। यह एक पुराने जमाने की औषधि है जो बहुत बढ़िया तरीके से काम करती है – युकालिप्ट्स के साथ स्टीम लेना। इसकी भाप लेने के लिए थोड़ा पानी उबालें उसमें थोड़ा युकालिप्ट्स का तेल या कुछ ताजे पत्ते डालें। और 2 मिनट के बाद इसकी भाप लें।



खर्राटे में क्या खाना चाहिए?

• मछली – खर्राटे मारने वाले व्यक्तियों को लाल मीट खाने की बजाए मछली का सेवन करना बहुत बढ़िया माना जाता है।
• सोया दूध – खर्राटे के मरीजों के लिए गाय के दूध की बजाए सोया का दूध बेहतर माना जाता है।
• चाय – चाय शरीर में से बलगम और कफ के जमाव को खत्म करती है। जिसके परिणामस्वरूप खर्राटे से राहत मिल सकती है।
• शहद – चाय के साथ शहद का मिश्रण को सोने से पहले सेवन करना चाहिए जिससे गले की मांसपेशियों को मजबूती मिलती है और खर्राटे कम होते हैं।
• हल्दी – यह सूजन के खिलाफ लड़ती है। इसके सेवन से गले में फालतू सूजन को हटाकर रास्ता साफ किया जा सकता जिससे खर्राटों में राहत मिल सकती है।
• प्याज – इसकी सुगंध शायद पसंद ना आए लेकिन प्याज खर्राटे की समस्या के लिए एक जीवन रक्षक औषधि मानी जाती है।

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